
कभी मंच साझा करते हुए ‘दो मजबूत नेताओं’ की दोस्ती का प्रतीक माने जाने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच अब रिश्तों की गर्माहट noticeably कम हो गई है। न अमेरिका में आमने-सामने मुलाकात, न किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में साझा उपस्थिति बस औपचारिक बधाइयों और प्रशंसाओं का सिलसिला जारी है। सवाल उठ रहा है कि आखिर दोनों के बीच यह दूरी क्यों बढ़ रही है? PM Modi Donald Trump News
इस साल जून में ट्रंप ने पीएम मोदी को कनाडा से लौटते वक्त अमेरिका रुकने का निमंत्रण दिया, मगर मोदी ने वह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। इसके बाद शर्म अल-शेख सम्मेलन के लिए भी आमंत्रण आया — जो ट्रंप की मध्यपूर्व शांति पहल का जश्न था पर प्रधानमंत्री ने इसमें भी शिरकत नहीं की और भारत की ओर से एक जूनियर मंत्री को भेजा गया। अब जब ट्रंप मलेशिया में हो रहे आसियान शिखर सम्मेलन में पहुंचे, मोदी ने वहां भी वर्चुअल माध्यम से भाग लिया। यह पिछले एक दशक में दूसरा मौका है जब प्रधानमंत्री ने आसियान मंच पर भौतिक उपस्थिति दर्ज नहीं की।
आगामी नवंबर में जब दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में G20 शिखर सम्मेलन होगा, ट्रंप ने पहले ही साफ कर दिया है कि वे उसमें शामिल नहीं होंगे। यानि, दोनों नेताओं की आमने-सामने मुलाकात अब लगभग एक साल बाद ही संभव दिख रही है। PM Modi Donald Trump News
2019-20 के बीच ‘हाउडी मोदी’ और ‘नमस्ते ट्रंप’ जैसे भव्य आयोजनों ने भारत-अमेरिका रिश्तों को नई ऊंचाई दी थी। ट्रंप को भारत के लिए भरोसेमंद रणनीतिक सहयोगी और मोदी को वॉशिंगटन में विश्वसनीय साझेदार के तौर पर देखा जाने लगा था। लेकिन, समय के साथ यह समीकरण बदल गया। फरवरी 2025 में वॉशिंगटन में मुलाकात के बाद जब दोनों ने अगली बैठक भारत में तय की, तभी से रिश्तों में ठंडक महसूस की जाने लगी। ट्रंप का यह दावा कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान युद्ध रुकवाया नई दिल्ली के लिए असहज था। मोदी सरकार ने इसे सिरे से खारिज किया। इसके बाद से ही दोनों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक संवाद में तनाव बढ़ता गया।
व्यापारिक टकराव – अमेरिका भारत के व्यापार घाटे को लेकर आक्रामक है। ट्रंप प्रशासन ने भारत पर भारी टैरिफ लगाए हैं और कृषि-डेयरी क्षेत्र खोलने की मांग कर रहा है, जिसे मोदी सरकार ने सख्ती से ठुकरा दिया।
रूसी तेल का मुद्दा – भारत रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदता रहा है। ट्रंप इसे घटाने के लिए दबाव डाल रहे हैं, जबकि भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देता है।
राजनीतिक छवि और स्वायत्तता – दोनों ही नेता अपनी घरेलू राजनीति में “मजबूत राष्ट्रवाद” की छवि बनाए रखना चाहते हैं। किसी भी तरह का समझौता उनकी राजनीतिक पूंजी को नुकसान पहुंचा सकता है।
रणनीतिक स्वतंत्रता – भारत हमेशा अपनी “स्वतंत्र विदेश नीति” पर जोर देता रहा है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति के साथ यह दृष्टिकोण कई बार टकरा जाता है।
कूटनीतिक गलियारों में यह धारणा बन रही है कि प्रधानमंत्री मोदी किसी ऐसे मंच से बचना चाहते हैं, जहां भारत को असहज स्थिति में दिखाया जाए। आसियान सम्मेलन में वर्चुअल भागीदारी को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।ट्रंप बार-बार यह दावा दोहरा रहे हैं कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान शांति स्थापित कराई और भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा, जबकि भारतीय विदेश मंत्रालय इन दावों को खारिज करता रहा है। ऐसी सार्वजनिक विरोधाभासों से दोनों देशों की “दोस्ती की छवि” कमजोर पड़ सकती है। मोदी सरकार यह संकेत देना चाहती है कि भारत किसी बाहरी दबाव में नहीं झुकेगा — न व्यापार पर, न ऊर्जा पर। वहीं ट्रंप भी ऐसे मंच से बचते हैं जहां उन्हें स्पष्ट ‘राजनीतिक जीत’ नजर न आए।
पीएम मोदी ने शर्म अल-शेख सम्मेलन में शामिल न होने का कारण “व्यस्त कार्यक्रम” बताया, पर विश्लेषकों का मानना है कि यह एक सुविचारित कदम था।दरअसल, ट्रंप ने उसी मंच पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को बुलाया था, जिन्होंने खुलकर उनकी तारीफ की और उन्हें दोबारा नोबेल शांति पुरस्कार के लिए सिफारिश की। ट्रंप का मंच पर यह पूछना कि “क्या भारत-पाकिस्तान अब दोस्त बनेंगे? मोदी के लिए एक असहज स्थिति होती। इस लिहाज से वहां न जाना राजनीतिक रूप से अधिक समझदारी भरा कदम था। PM Modi Donald Trump News
नई दिल्ली इस पूरे घटनाक्रम को केवल “दूरी” नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता की अभिव्यक्ति के रूप में देख रही है। अमेरिका के बढ़ते दबावों के बीच भारत अपनी नीतियों को ‘समझौते की मजबूरी’ नहीं बनने देना चाहता।
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